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गुरू पूर्णिमां पर कैसे करें गुरू की पूजा : Worship the Guru on Guru Poornima

गुरू पूर्णिमां पर कैसे करें गुरू की पूजा

 गुरू ब्रम्हा गुरू विष्णू, गुरूः देवो महेश्वरा
गुरू शाक्षात परब्रम्हा, तस्मै श्री गुरूवे नमः

पदम सैनी 
मनुष्य जीवन बड़ी ही मुश्किल से मिलता है और इस जीवन में हर कदम पर गुरू की आवश्यकता होती है। हमारे जीवन और सस्कृति में गुरू का जो स्थान है शायद ही इससे ज्यादा जरूरी कोई चीज होगी। इन्सान की उत्पत्ति से लेकर आधुनिक युग के इस चकाचौंध तक गुरू का अपना ही रोल रहा है। हर वर्ष की तहर साल में एक बार आने वाला गुरू पूर्णिमा का यह पर्व इस वर्ष 27  जुलाई, को है. गुरू महिमा पर कबीर दोहे

इस गुरू पूर्णिमा पर कैसे बनाएं गुरू जानिए-
 यह तन विष की बेलरी, गुरू अमृत की खान।
शीश दिए जो गुरू मिले तो भी सस्ता जान।

कहने का अर्थ यह है कि गुरू इतने सस्ते में और सहजता से नहीं मिलते। लाखों करोड़ों के बीच उस सच्चे गुरू की पहचान करना और पहचान करके उसे गुरू बनाना यह भी कोई साधारण बात नहीं और वो सच्चा गुरू भी आपको अपना शिष्य बना ले, यह भी अपने आप में बड़ी बात है। आप अपनी सारी इच्छाएं, धन-दौलत और पूरा जीवन न्यौछावर करके भी अगर आपको गुरू पूर्णिमा पर सच्चा गुरू मिल जाए तो समझो आपको तीनों जहान की दौलत मिल गई। 



 जीवन की गुरू की महतत्ता
 ब्रहमचर्य जीवन में आप जी रहे है तो आपको उचित मार्ग बताने वाले गुरू की आवश्यकता है, यही वो समय होता है जो तय करता है कि हम अच्छाई की ओर जायेंगे या बुराई की ओर। अच्छे गुरू की यह पहचान होती है कि अबोध बालक को सही रास्ता दिखलाये। यदि अच्छा गुरू मिलेगा तो अच्छी शिक्षा मिलेगी, तो अच्छे संस्कार मिलेंगे, तो अच्छी आदते आयेंगी जो जीवन के अन्तिम समय तक काम आयेगी। इन्सान के मरने के बाद भी सदियों-सदियों तक यदि उस इन्सान के अच्छे कर्मों की गाथाएं गाई जायेगी तो सही मायने में आपके गुरू ने जो अच्छी शिक्षा दी उसी का परिणाम होगा।
गुरू द्वारा दी गई वो शिक्षा गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ से लेकर सन्यास और आपके जीवन के बाद जो आपकी अच्छी बातों कीे, जो समाज और राष्ट्रनिर्माण में भागीदारी होगी।




वैसे तो गुरू पूर्णिंमा का दिन गुरू बनाने के लिए श्रेष्ठ माना गया है। ऐसा मानना है कि इस दिन गुरू की आभा पूर्णिंमा के चांद की तरह होती है। इन्सान यदि यह सोचता है कि मुझे गुरू पूर्णिंमा के दिन ही गुरू बनाना है तो उस सोच के पीछे यहीं एक पारम्परिक बात निकलकर आती है कि इस दिन गुरू की गई सेवा और पूजा का भरपूर लाभ मिलता है।
यदि आपके माता-पिता जिन्दा है तो उनसे बड़ा गुरू शायद ही आपको  इस सृष्टि पर मिले। माता-पिता ही है जिनके कारण आज हम सभी लोग यह दुनिया देख पा रहे है। इसलिए प्रातः वन्दनीय माता-पिता होते है। इसलिए इनकी पूजा प्रतिदिन करें और गुरू पूर्णिंमा के दिन तो विशेष पूजा करें।

गुरू ऐसा हो जो आपको अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जायें।
गुरू ऐसा हो जो आपको अंधियारे से उजाले की ओर ले जायें।
गुरू ऐसा हो जो आपको सही रास्ते की ओर ले जायें।

गुरू पूर्णिमा पर गुरू बनाने से पहले यह अच्छे से तय कर ले कि किसे गुरू बना रहे है और क्या वह हमें अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जायेंगे। एक अच्छा गुरू आपके इस लोक और परलोक तक के सभी कष्ट निवारण कर देता है और यदि सच्चा गुरू ना मिले तो आप चौरासी के चक्कर में ही पड़े रहेंगे। इसलिए अच्छे से तय करने के लिए मैं कह रहा हूं कि गुरू कोई कपड़े नहीं जो आप हर दिन बदल लें। गुरू का स्थान सबसे बड़ा होता है। यदि कोई खिलाड़ी है या पुजारी है, लेखक है ऐसे सभी वो लोग जो अपने-अपने कार्य क्षेत्र में सफल होते है तो उन लोगों की सफलता के साथ इनके गुरूओं की भी चर्चा होती है। जैसे कि सचिन तेंदुलकर एक महान बल्लेबाज हुए हैं तो उनके पीछे वो, गुरू ही हैं। आज जब भी सचिन की बात होती है तो उनके गुरू की बात जरूर होती है।


गुरू पूर्णिंमा का वो विशेष दिन नजदीक आने वाला है तो एक ऐसा गुरू बनायें जो आपका हाथ पकड़कर आपको भवसागर पार करा दें। कहते है कि यदि गुरू पूर्णिंमा के दिन यदि गुरू के दर्शन हो जायें तो इससे बड़ा अवसर आपके जीवन में कभी नहीं होगा। तो इस गुरू पूर्णिमा को यदि आपने गुरू बना रखा है तो उनकी पूजा अवश्य करें।
गुरू पूर्णिमा पर कैसे करें गुरू की पूजा
इस वर्ष की गुरू पूर्णिमा रविवार के दिन आ रही है, जोकि अवकाश का दिन होता है। तो आप इस वर्ष अपने गुरू को और अधिक समय दे पाएंगे। सबसे पहले सुबह नहा-धोकर अपने माता-पिता व बड़ों का आशीर्वाद लेकर एक फूलों की माला नारियल, रोली, मोली, व मिठाई लेकर अपने गुरू के पास पहुंचे। सबसे पहले गुरू पूर्णिमा के दिन व हर दिन जब भी समय मिले, सच्चे मन से अपना शीश नवाएं व गुरू के चरणों में वंदन कर उन्हें माला पहनाएं, तिलक लगाकर हाथ में मोली बांधकर नारियल व मिठाई का डिब्बा भेंट करें व आशीर्वाद लें। तत्पश्चात आपके गुरू द्वारा बताए गए मार्ग पर चलें। क्योंकि यदि इन्सान गुरू के बताए सही मार्ग पर चलेगा तो उसे जीवन में कोई कष्ट नहीं आएगा।


गुरू की आज्ञा
गुरू गोविंद दोउ खड़े का के लागंू पाय,
बलिहारी गुरू आपने जिन गोविंद दियो बताय।


गुरू के बताए हुए मार्ग पर जरूर चलें। क्योंकि गुरू की आज्ञा और उसके बताए हुए रास्ते पर चलने से इन्सान को जीवन सार्थक हो जाता है। क्योंकि गुरू विश्वामित्र जी के कहने पर श्रीराम ने शिवजी का धनुष भी तोड़ दिया था।
यदि इस गुरू पूर्णिमा पर किसी कारणवश आप अपने गुरू के दर्शन करने नहीं जा पाएं तो घर में लगी हुई तस्वीर के सामने ही पूजा-अर्चना कर अपने गुरू का ध्यान करें।



क्यों आती है गुरू बनाने में परेशानी?
आधुनिक समय के इस पहर में यूं तो कई सन्त-महात्मा और बाबा हैं पर इन्सान भटक जाता है कि किसे गुरू बनायें और किसे नहीं? इसी असमंजस में इन्सान का काफी समय गुजर जाता है। इसमें उस व्यक्ति की भी पूर्णतया गलती नहीं मानी जायेगी क्योंकि वर्तमान में जो हम खबरों के माध्यम से कुछ साधु-सन्तों के बारे मंे देखते है व सुनते है, उससे मन में एक अजीब सा डर पैदा हो जाता है कि गुरू बनायें या नहीं। इस शंका समाधान में ही व्यक्ति का अधिक समय निकल जाता है।
लाल ना रंगहो, हरि ना ही रंगहो ऐसी रंगो जैसे मेरे सतगुरू डगरिए
कहने की बात यह है कि ऐसा गुरू हो जो आपको इस सांसारिक मोह और चकाचौंध से दूर रखे व सच्चाई के मार्ग पर ले जाए।

गुरू पूर्णिमा पर एक और बात
यूं तो काशी-काबा एक है, एक है राम-रहीम। पर हमारे समाज में कुछ लोगों ने इन्सान को कई जातियों और समुदायों में बांट दिया है। पर यदि सच्चाई से देखा जाए तो हिन्दू गुरू पूर्णिमा को गुरू पूजा के लिए विशेष मानता है। सिख समाज में तो गुरू पर्व मनाया जाता है। वहीं क्रिसमस के रूप में ईसाई धर्मावलम्बी जीसस को याद करते हैं तो मुस्लिम भाई 5 समय की नमाज अता कर अल्लाह के घर में हाजिरी लगाते हैं। चाहे किसी रूप में किसी भी धर्म में हो सच्चे मन से ऊपर वाले की पूजा करें।

आधुनिक गुरू
पहले के समय में तो गुरू ही शिक्षा एवं दीक्षा का माध्यम था। लोग गुरूकुल में रहकर गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलते थे। पर आधुनिक युग में लोग गुगल को भी गुरू मानते हैं। और गुगल ही नहीं टैक्स गुरू जैसे हर विषय के गुरूओं का बोलबाला है। पर इसमें भी आप सावधानी बरतें। क्योंकि सही चुनाव नहीं किया तो आपको नुकसान हो सकता है।
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