अक्ल बड़ी या उम्र Intelligence vs Age in Hindi - Hindi Haat

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अक्ल बड़ी या उम्र Intelligence vs Age in Hindi

अक्ल बड़ी या उम्र Intelligence vs Age in Hindi 

जीवन में ज्ञान से ज्यादा महत्व ज्ञान की तासीर का है। स्कूल-कॉलेज में भारी-भरकम किताबों से हासिल किया ज्ञान जब जीवन की भट्टी में तपता है, तब जो हमारे पास बचता है, वही वास्तव में ज्ञान की तासीर है।


प्रियंका अग्रवाल @hindihaat 
     अक्ल बड़ी या उम्र। इस सवाल का जवाब अगर मैं आपसे पूछूं तो?  है कोई जवाब... होगा, यकीनन होगा। चलिए..अब यही सवाल अपने से बड़ों या बच्चों से पूछ कर देखिए। उनका जवाब आपके जवाब से अलग होगा। बहस-मुबाहिसों में अगर यह सवाल उठ जाए तो बात खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। आइए, इस अनसुलझे सवाल के तार्किक जवाब तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। 

छोटी उम्र में बड़ा कमाल 

     आजकल की smart generation स्मार्ट जेनरेशन के सामने टिक पाना वाकई मुश्किल है। स्मार्ट फोन, लैपटॉप तो मानो छोटे बच्चे अभिमन्यु की तरह मां के गर्भ से ही सीख कर आते हैं। अक्षर ज्ञान से पहले उन्हें टेक्नोलॉजी का ज्ञान हो जाता है।  युवा बेटा अवसर मिलने पर अपने पिता के व्यवसाय को अपने नए तौर-तरीकों से नई ऊंचाइयों पर ले जाता है और कितनी ही बार छोटी सी उम्र में बच्चे ऐसा कुछ कर जाते हैं, कि पूरी दुनिया उन्हें जानने लगती है।  कुछ ही दिन  पहले खबर पढ़ने को मिली। ब्रिटेन में रहने वाले 11 साल के भारतवंशी बच्चे अर्णव शर्मा ने Mensa IQ Test मेन्सा आईक्यू टेस्ट में 162 अंक का स्कोर हासिल किया।  कहा  जा रहा है कि इस बच्चे का स्कोर महान वैज्ञानिक Albert Einstein अल्बर्ट आइंस्टाइन और Stephen Hawking स्टीफन हॉकिंग से भी दो अंक ज्यादा है। 10 साल के बच्चे हार्दिक उप्रेती के बारे में भी आपने इस वेबसाइट पर पढ़ा होगा, जिसने A Christmas Miracle नाम से उपन्यास ही लिख दिया है।

मुहम्मद बिन तुगलक  के फरमान Experiments of Muhammad Bin Tughlaq 

     अक्लमंदों की बात चली है तो दिल्ली के तख्त पर बैठे अक्लमंद सुल्तान Muhammad Bin Tughlaq मुहम्मद बिन तुगलक का जिक्र लाजिमी है। वह उच्च शिक्षित था, फारसी, अरबी, तुर्की और संस्कृत भाषाओं पर उसकी पकड़ थी। अपनी सल्तनत में  दक्षिणी राज्यों पर बेहतर नियंत्रण के मकसद से वह राजधानी दिल्ली से दौलताबाद ले गया। न सिर्फ राजधानी बल्कि दिल्ली शहर के सभी बाशिंदों को दौलताबाद जाने का फरमान सुना दिया गया। लोग अपनी गृहस्थी समेट कर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर दौलताबाद पहुंचे जरूर पर विषम परिस्थितियों के कारण रास्ते में ही सैकड़ों लोगों की मौत हो गई। कुछ साल बाद जब उत्तर पर पकड़ ढीली हुई तो वह वापस राजधानी दिल्ली ले आया। चीन और ईरान से प्रेरणा लेकर तुगलक ने अपने शासन में तांबे और पीतल के सिक्के चलवाए, जिनका मूल्य चांदी की मुद्रा के बराबर था। सिक्कों की ढलाई अच्छे स्तर की नहीं थी। नतीजा यह हुआ की जाली टकसालों में तांबे और पीतल के सिक्के बनने लग गए। यहां तक कि लोग जाली सिक्कों से ही जजिया अदा करने लग गए। इस तरह शाही खजाना जाली मुद्रा से भर गया। आखिरकार सुल्तान को तांबे और पीतल के सिक्के बंद करने पड़े। अपनी अव्यावहारिक नीतियों पर आधारित तुगलकी फरमानों के कारण ही मुहम्मद बिन तुगलक को इतिहास में ‘विद्वान मूर्ख’ The wise fool के रूप में जगह मिली। जिन लोगों के पास ज्ञान का विशाल खजाना हो जरूरी नहीं कि उनके पास उसका व्यावहारिक अनुभव भी उतना ही हो। किताबी ज्ञान के धनी और व्यावहारिक ज्ञान में शून्य ऐसे लोगों की आज भी कोई कमी नहीं है। 

ज्ञान का महत्व Importance of knowledge 

     कई लोग जन्मजात अक्लमंद होते हैं, तो कई अपने जीवन के सफर में अक्लमंदी हासिल करते हैं। वहीं, कई ऐसे भी होते हैं जो बचपन में जितने नासमझ थे, पचपन का होने पर भी उतने ही नासमझ रहते हैं क्योंकि वे अपनी गलतियों से नहीं सीखते। दरअसल जीवन में ज्ञान से ज्यादा महत्व ज्ञान की तासीर का है। स्कूल-कॉलेज में भारी-भरकम किताबों से हासिल किया ज्ञान जब जीवन की भट्टी में तपता है, तब जो हमारे पास बचता है, वह सही मायने में ज्ञान की तासीर है। 
     एक जहाज का इंजन फेल हो गया। तमाम कोशिशों के बाद भी कोई इसे ठीक नहीं कर पा रहा था। बड़े से बड़े इंजीनियर नाकाम हो गए। किसी के बताने पर एक मैकेनिक को लाया गया। उसने इंजन की गहनता से जांच परख की, हर चीज को बारीकी से देखा। फिर धीरे से उसने अपना थैला उठाया और  उसमें से एक छोटा सा हथौड़ा निकाला। एक पुर्जे को उसने हथौड़े से हल्का सा ठोंका और एकदम से इंजन में जान आ गई। 
कुछ दिन बाद जहाज मालिक को ईमेल से बिल मिला। बिल देखकर वह कुर्सी से उछल पड़ा। दस हजार डॉलर!, मालिक ने मैकेनिक को फोन मिलाया, इतना बड़ा बिल क्यों, तुमने तो कुछ किया ही नहीं, डिटेल बिल भेजो। मैकेनिक ने मुस्करा कर जवाब दिया, हथौड़े से चोट मारने के 2 डॉलर और कहां चोट मारनी है, यह पता होने के 9998 डॉलर। 

किताबी ज्ञान या अनुभव Bookish knowledge vs Practical Knowledge

     किताबी ज्ञान से कहीं ज्यादा काम का व्यावहारिक ज्ञान होता है। दुनिया में कितने ही महान आविष्कार अनुभव के समुंदर से निकले हैं। थॉमस अल्‍वा एडिसन बल्ब को बनाने में 10000 बार से भी ज्यादा असफल हुए। उनकी असफलता पर जब उनसे किसी ने प्रश्न पूछा तो उनका कहना था कि वे नाकामयाब नहीं हुए हैं, उन्होंने 10,000 ऐसे रास्ते निकाले लिए हैं, जो उनके काम नहीं आ सके। 
वास्तव में देखा जाए तो ज्ञान और अनुभव एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अनुभव की नींव पर ही ज्ञान की इमारत खड़ी होती है और अपने ज्ञान के आधार पर ही हम अपने अनुभव को और विस्तार दे सकते हैं। अब सवाल उठता है कि अनुभव कैसे मिले। जो शख्स रोज एक ही काम को एक ही तरीके से करता है, बाल सफेद हो जाने के बाद भी उसके अनुभव शून्य ही रहता है। अनिश्चित, अनिष्ट और आशंकाओं का भय जब खत्म हो जाता है, तभी व्यक्ति अनुभव के समंदर में गोते लगाने का साहस कर पाता है। कई सौ साल पहले कबीर दास जी भी कह गए हैं- जिन ढूंढ़ा तिन पाइयां गहरे पानी पैठ। मैं बोरी डूबन डरी, रही किनारे पैठ।। 

उपहार में दें अनुभव Give experiences instead of gifts 


     अब बात करते हैं एक ऐसी भूल की जो हम अक्सर हर रोज करते हैं। घर का कोई काम हो या किताबों में दिए सवाल। हम बच्चों को ठीक वही तरीका अपनाने को कहते हैं, जैसे कि हम खुद किया करते हैं।  इस  तरह हम उसकी समझ को कम मानते हुए अपने अनुभव उन पर थोप देते हैं और उन्हें  उनके मौलिक अनुभवों का खजाना बढ़ाने से रोक देते हैं।
     बचपन के अनुभव उम्र भर हमारे साथ रहते हैं। हमारे जीवन के शुरुआती वर्षों के अनुभव भविष्य में लिये जाने वाले फैसलों पर अपना असर डालते हैं। हमारे जेहन में बचपन की जो यादें अब भी ताजा होंगी, उनमें से ज्यादातर वे होंगी, जब हम पूरे परिवार के साथ कहीं पिकनिक पर जाया करते थे या गर्मियों की छुट्टियों में कहीं भी टूर पर निकल जाया करते थे। अलग-अलग स्टेशन, सफर के दौरान मिलने वाले लोग, उनकी भाषा, सफर की परेशानियां, रोमांच और मस्तियां, हमें कई तरह के अनुभव एक साथ ही दे देते हैं। बचपन में जिन खिलौनों के साथ खेले उनसे ज्यादा अपने भाई बहनों या दोस्तों के साथ की गई शरारतें याद आती हैं। ऐसा इसलिये है कि बच्चे महंगे खिलौनों या सुख-साधनों  की अपेक्षा इस तरह के अनुभवों से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं। 
      अभी हाल ही की घटना है। मेरे बेटे की साइकिल घर के बाहर से चोरी हो गई। मैं पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने के लिए जाने लगी तो बेटे को साथ में चलने के लिये कहा। वह पुलिस के नाम से ही घबराता था, इसलिये जोर-जोर से रोने लगा। किसी तरह समझाने के बाद साथ चलने को तैयार हुआ। थाने में इंचार्ज ने न सिर्फ उससे प्यार से बात की, बल्कि उसे साइकिल ढूंढवाने का भरोसा भी दिलाया।  रिपोर्ट लिखाकर घर आए तो उसका डर पूरी तरह से निकल चुका था। यह नया अनुभव उसकी जिन्दगी में जुड़ गया था। 
     इसलिये मेरी ओर से बिन मांगी सलाह यह है कि जब भी कभी बच्चों को उपहार देने का अवसर आए, तो महंगे खिलौनों की जगह अनुभव उपहार में देने चाहिये। नई जगह, नए लोग, नई बातों को जानने के अनुभव। उन्हें हर कदम पर जीवन के नए अनुभव लेने का मौका देना चाहिए। चांदी की चम्मच हाथ में थमा दी तो वे स्वादिष्ट व्यंजनों से भरी थाली को भी बेस्वाद बताकर ठुकरा देंगे।  सही अवसर को नहीं पहचान पाएंगे और बाद में पछताएंगे। 

नया सीखने की कोई उम्र नहीं No one is too old to learn

     वैसे बच्चों की ही बात क्यों करें। नया सीखने और नए अनुभव लेने की कोई उम्र नहीं होती। आप और हम ऐसे कितने ही सीनियर सिटिजन को जानते होंगे जो बचपन में लकड़ी की पट्टी पर कलम से लिखा करते थे और आज माउस- की बोर्ड पर जिनकी उंगलियां थिरकती हैं।  कन्फूशियस ने कहा था मैं सुनता हूं और भूल जाता हूं, मैं देखता हूं और याद रखता हूं, मैं करता हूं और समझ जाता हूं। इसलिए चाहे आप कितने ही अक्लमंद हो या कितने ही उम्रदराज, नए अनुभव लेने में न स्वयं हिचकें और न ही दूसरों को रोकें। पलड़ा उसी का भारी होगा, जिसके अनुभवों का खजाना बड़ा होगा। 

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