Bhagat Singh Execution and Biography in Hindi - Hindi Haat

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Bhagat Singh Execution and Biography in Hindi



भगत सिंह की फांसी और जीवनी


24 मार्च 1931 की सुबह भारत के इतिहास में सबसे गमगीन सुबहों में से एक है। क्योंकि उस दिन के अखबारों की हैडलाइन में जो समाचार था, वह बड़ा ही विचलित करने वाला था। बिजली की तरह यह खबर फैल गयी कि जेल मैनुअल को दरकिनार करते हुए सरदार भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव को सोमवार 23 मार्च 1931 को ही नियत तिथि और नियत समय से पूर्व शाम 7 बजकर 33 मिनट पर लाहौर सेंट्रल जेल Lahore Central Jail में फांसी दे दी गई। जिस वक्त भारत के तीनों सपूत अपनी सरजमीं की आजादी के लिए फांसी पर लटकाए जा रहे थे उस वक्त पूरा जेल 'इन्कलाब जिंदाबाद' के नारों से गूंज रहा था।



फांसी का दृश्य देखने आए एक यूरोपियन डिप्टी कमिश्नर से फांसी से पहले कहा कि 'मजिस्ट्रेट महोदय! आप वास्तव में बड़े भाग्यशाली हैं, जो आपको यह देखने का अवसर प्राप्त हो रहा है, कि किस तरह एक भारतीय क्रांतिकारी अपने महान आदर्श के लिए हंसते-हंसते मृत्यु का आलिंगन करता है।'

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भारत में ब्रिटिश राज के इतिहास में यह पहला अवसर था, जब किसी सजा को बदलवाने के लिए इतना जबरदस्त देशव्यापी आंदोलन हुआ हो। इंगलैंड पर भी इस आंदोलन का इतना असर हुआ कि भारत में इतने एकजुट जनमत को देखकर वायसराय तक दहल उठे थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भगत सिंह की शहादत को कुछ इस प्रकार व्यक्त किया था— 'पर जो अब नहीं रहा है, उसके लिए अभिमान बना रहेगा और जब इंग्लैंड हमसे बातें करेगा और समझौते के लिए कहेगा तो हमारे बीच में भगत सिंह की लाश पड़ी होगी, जिससे कहीं हम उसे भूल न जाएं, कहीं हम उसे भूल न जाएं।'


भगत सिंह का छोटे भाई को अंतिम खत

Last Letter of Bhagat Singh


भगत सिंह अपने छोटे भाई कुलतार सिंह से बहुत प्यार करते थे। कुलतार सिंह को अपने अंतिम पत्र में भगत सिंह ने लिखा था किभोर के समुज्ज्वल प्रकाश के सामने, भाग्य के लेखे को कौन टाल सकता है? यदि सारा संसार भी हमारे विरुद्ध खड़ा हो तो हमें उसकी क्या परवाह?



भगतसिंह का परिवार एवं जन्म

Birth and Family of Bhagat Singh

भगतसिंह पंजाब के लायलपुर में एक सिक्ख परिवार में जन्मे थे। इनके पूर्वज पंजाब के राजा रणजीत सिंह के समय 'खालसा सरदार' के नाम से प्रसिद्ध थे। भगतसिंह के पितामह अर्जुनसिंह एक बड़े जमींदार थे और दादी जयकौर एक आदर्श महिला थीं जिन्होंने ही अपने बेटों और पौतों की परवरिश की थी। सरदार अर्जुनसिंह के तीनों बेटे किशनसिंह, अजीतसिंह और स्वर्णसिंह देश-प्रेम के लिए पूरे पंजाब में प्रसिद्ध थे। भगतसिंह के चाचा सरदार अजीतसिंह ने ही लाला लाजपतराय को राजनीति की ओर आकर्षित किया था। जब बंगाल का आंदोलन पंजाब में गति पकड़ रहा था तब भगतसिंह के पिता किशनसिंह तथा चाचा स्वर्णसिंह भी पूरी सक्रियता से इसमें जुटे हुए थे। भगतसिंह के चाचा स्वर्णसिंह की मृत्यु 1907 में जेल में ही हो गयी थी। लगभग उसी समय 27 सितम्बर 1907 को भगतसिंह का जन्म हुआ था।



भगतसिंह की शिक्षा

Education of Bhagat Singh

भगतसिंह और उनके बड़े भाई जगतसिंह को लायलपुर जिले के बांगा नामक स्थान के एक प्राइमरी स्कूल में भर्ती कराया गया था। उनके बड़े भाई की मृत्यु 11 वर्ष की उम्र में ही हो गयी थी जिसका भगतसिंह के हृदय पर गहरा असर पड़ा। इसके बाद भगतसिंह को हाई स्कूल के लिए लाहौर के दयानंद एंग्लो-वैदिक स्कूल में भर्ती कराया गया। यहां से उन्होंने मैट्रिकुलेशन परीक्षा पास की। इसके बाद भगतसिंह नेशनल कॉलेज में पढ़ने लगे जहां उनकी मुलाकात सुखदेव जैसे क्रांतिकारी और यशपाल से हुई। इस वक्त चौदह वर्ष की उम्र में ही भगतसिंह ने क्रांतिकारी संस्थाओं में भाग लेना शुरू कर दिया था। अक्टूबर 1926 में भगतसिंह को पंजाब पुलिस ने लाहौर के दशहरा मेले में बम फेंकने के झूठे आरोप में पकड़ कर बोर्स्टल जेल में बंद कर दिया। यह वही जेल थी जहां ढाई साल बाद उन्होंने और उनके मित्रों ने राजनैतिक कैदियों के साथ दुर्व्यवहार के विरोध में कठिन अनशन व्रत धारण किया था। बहुत दिनों तक मामला चलने के बाद उस समय मजिस्ट्रेट ने भगतसिंह को 60,000 रुपये के भारी मुचलके पर छोड़ा गया था। इसके बाद हाइकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के मुचलके के आदेश को रद्द किया था।

भगतसिंह और एसेम्बली बम कांड

Assembly Bomb Case

वामपंथी कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित भगतसिंह ने सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए कि उनकी आवाज ब्रिटिस साम्राज्य तक पहुंचे और कोई खून-खराबा भी नहीं हो। उन्होंने एक योजना बनाई और बटुकेश्वरदत्त को अपने साथ के लिए चुना। इस समय बम्बई में मजदूर आंदोलन जोरों पर था। आंदोलन को रोकने के लिए सरकार एसेम्बली में एक कानून लाना चाहती थी। इसी बीच 8 अप्रैल 1929 को हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य भगतसिंह और बटुकेश्वरदत्त ने एसेम्बली भवन में पुलिस के कड़े पहरे के बावजूद बिना किसी के देखे घुस गए। उन्होंने सरकारी अफसरों की ओर दो बम फेंके जिनके फटते ही सारा भवन धुंए से भर गया। इससे किसी को भी चोट नहीं आयी, जैसा कि भगतसिंह चाहते थे। 

सभी सदस्य इधर-उधर दौड़ पड़े। दर्शक धीर्घा भी खाली हो गई। कुछ लोग निश्चल भाव से अपने स्थान पर खड़े रहे। इनमें पंडित मोतीलाल नेहरू, पंडित मदनमोहन मालवीय और सर जेम्स क्रेरर भी थे। वहीं दूसरी ओर बम फेंकने वाले भगतसिंह और बटुकेश्वरदत्त सेंट्रल गेट और महिला गैलेरी के बीच स्थिर भाव से खड़े थे। वे चाहते तो बाकी लोगों के साथ वहां से भाग सकते थे। दोनों के पास रिवॉल्वर थी, वे सरकारी और पुलिस अफसरों को मार भी सकते थे परन्तु दोनों ने अपनी इच्छा से पुलिस के सामने अपने हथियार रख दिए और 'इन्कलाब-जिंदाबाद' तथा 'साम्राज्यवाद का नाश हो' जैसे नारे लगाते हुए आत्म-समर्पण कर दिया। इस वक्त उन्होंने कुछ पर्चे भी वहां फैंके जिस पर लिखा था 'बहरे को सुनाने के लिए जोर से कहना पड़ता है।'

भगतसिंह के पसंदीदा उपन्यास 

Favorite Novels of Bhagat Singh

साम्यवाद भगत सिंह का प्रिय विषय था। इसके बावजूद उन्होंने उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ से लेकर 1917 के अक्टूबर की क्रांति तक के रूसी क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास का भी गहन अध्ययन किया था। लोगों का मानना था कि भारत में कम ही लोग इस विषय पर उनके सामने ठहर सकते थे। जेल में उन्होंने प्रसिद्ध उपन्यासकार चार्ल्स डिकन्स के उपन्यासों को पढ़ना शुरू किया। उपटॉन सिंक्लेयर की बोस्टन, जंगल, आॅयल तथा क्राई फॉर जस्टिस, हॉल केन की ईटर्नल सिटी, रीड की टेन डेज दैट शूक दी वर्ल्ड, रॉस्फिन की वॉट नेवर हैपन्ड तथा मैक्जिम गोर्की की मदर उनकी पसंदीदा पुस्तकों में से थीं। भगत सिंह स्टैपनियेक की पुस्तक बर्थ आफ ए रशियन डेमोक्रेसी को सबसे अच्छी पुस्तक बताते थे। उनके क्रांतिकारी विचारों पर माइकिल बेकुनिन का खासा प्रभाव था।

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भगत सिंह का जेल में लेखन

Bhagat Singh in Jail and his Writings

भगत सिंह ने जेल में पढ़ने का ही नहीं बल्कि लिखने का भी काम किया। उनकी स्मरण शक्ति भी उल्लेखनीय थी। अपनी ही पहली किताब रिवोल्यूशनरी के प्रथम खण्ड का पहला अंक उन्हें जुबानी याद था। इसे हिंदुस्तार रिपब्लिकन एसोसिएशन ने प्रकाशित किया था और इस किताब को फरवरी 1925 में पूरे भारत तथा बर्मा में बांटा गया था। भगत सिंह ने जेल में मेहनत कर भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास भी लिख डाला था। इसे लिखने के लिए उन्हें बांग्ला भी सीखनी पड़ी। समय-समय पर वे क्रांतिकारी पर्चों के लिए भी सामग्री तैयार किया करते थे जिसमें फिलॉसफी आफ दी बॉम्ब उल्लेखनीय है। फांसी से कुछ ही समय पहले उन्होंने नौजवान राजनैतिक कार्यकर्ताओं के नाम एक संदेश भेजा था, जिसे देश के नाम उनकी आखिरी वसीयत कहा जा सकता है।



भगतसिंह ही क्रांति

Revolution of Bhagat Singh

भगतसिंह की नजर में क्रांति की परिभाषा गरीबों और अपेक्षित वर्गों के अधिकारों से जुड़ी थी। जब एक निचली अदालत ने भगत सिंह से पूछा किक्रांति से उनका क्या मतलब है? तो उन्होंने कहा कि— ''क्रांति का मतलब केवल खूनी लड़ाइयों अथवा वैयक्तिक वैर निकालना नहीं है। और न बम अथवा पिस्तौल का प्रयोग करना ही उसका एकमात्र उद्देश्य है। क्रांति से हमारा अभिप्राय केवल उस अन्याय को समूल नष्ट कर देना है, जिसकी भित्ती पर वर्तमान शासन-प्रणाली का निर्माण हुआ है।''

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