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Essay on Cooperative Movement in Hindi

सहकारिता पर निबंध 
Essay on Cooperative Movement in India


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        भारत में सहकारिता एक सफल आंदोलन बन चुका है. डेयरी और कृषि के क्षेत्र में सहकारी आंदोलन ने भारत भर में मील के पत्थर स्थापित किए है. इस आंदोलन का विचार विदेशी धरती पर जन्मा है. सहकारिता के जन्मदाता राबर्ट ओवेन हैं. उन्होंने ही सहकारिता की नींव रखी.

सहकारिता की परिभाषा Definition of Cooperative

        अर्थशास्त्री स्ट्रिकलैंड के अनुसार सहकारिता की यह परिभाषा दी जा सकती है कि कुछ व्यक्तियों की ऐसी संस्था जो ईमानदारी और सामूहिक दिलचस्पी के साथ काम करके कोई आर्थिक ध्येय प्राप्त करना चाहे. साथ ही साथ इस सहयोग की बुनियादें स्वयं सेवा की भावनाओं और जनस्वतंत्रता पर आधारित हो..

सहकारिता का इतिहास History of Co-operative

        इंग्लैण्ड के राबर्ट ओवेन ने श्रमिक वर्ग के जीवन पर उन हानिकारक प्रभावों का बड़ी गंभीरता से परीक्षण किया जो उस समय का धनिक वर्ग उन पर डाल रहा था. श्रमिकों की इस दुर्दशा से व्यथित होकर ओवेन ने सहयोग को आधार बनाकर सामुहिक हित लाभ के लिए काम करने के विचार पर काम करना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे उनका विचार लोकप्रिय हो गया और सहकारिता धनिक वर्ग के शोषण से बाहर निकलने के एक कारगर औजार के रूप में विकसित हो गया.
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भारत में सहकारिता का इतिहास
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        भारत में सहकारिता का विकास कृषि क्षेत्र मे काम कर रहे किसानों की दशा को सुधारने के लिए विकसित किया गया. जब भारत में  सहकारिता की शुरूआत हुई, उस वक्त देश का किसान साहूकारों और महाजनों के जाल में फंसा हुआ था. हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी उसे अपने परिश्रम का पूरा फल नहीं मिल रहा था. साथ ही उस वक्त देश के कुटीर उद्योग धंधों की भी हालत खराब थी. परम्परागत हस्तशिल्प और रोजगार से जुड़े लोगों को उचित दाम और बाजार नहीं मिल रहा था.


         उस वक्त भारत में अंग्रेजी राज की हुकूमत थी और भारत के किसानों और शिल्पकारों की सुनने वाला कोई नहीं था. ऐसे में 1892 में एक अंग्रेज महोदय सर फ्रेडरिक निकल्सन ने मद्रास के गवर्नर से भेंट कर अनुरोध किया कि भारत के श्रमिकों के लिए उन्हें जर्मनी की रेफीसेज सोसाइटियों की तर्ज पर कृषि बैंक स्थापित करने की आज्ञा दी जाए. सन 1904 में उनके प्रयासों से सहकारी साख एक्ट पास हुआ. इस एक्ट के अनुसार प्रत्येक प्रान्त में सहकारी साख समितियों ने जन्म लिया. सरकार ने भी इन साख समितियों को प्रोत्साहित करने का काम किया. पहला एक्ट होने की वजह से इस एक्ट में कई कमियां थी. सबसे बड़ी कमी यह थी कि इस एक्ट के आधार पर सिर्फ साख सहकारी समितियों का ही निर्माण किया जा सकता था और दूसरी प्रकृति की सहकारी समितियों के लिए कोई प्रावधान नहीं था. इन कमियों को दूर करने के लिए 1912 में एक्ट में संशोधन किया गया और नये एक्ट के अनुसार तीन तरह की समितियों के गठन के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया. अब यूनियन, केन्द्रीय और प्रादेशिक स्तर पर सहकारी बैंक खोले जाने लगे.
        सन 1919 में एक बार फिर इस एक्ट मे बदलाव किए गए और सहकारिता को केन्द्र की जगह प्रदेशों को सौंप दिया और सहकारिता प्रादेशिक सरकारों के अधीन आ गई.1930 तक आते-आते पूरे भारत में सहकारिता आंदोलन तेजी से फैला और सहकारी समितियों की संख्या 30 हजार के आस-पास हो गई.
        भारत में सहकारी समितियों ने कृषि साख की सूरत ही बदलकर रख दी और परम्परागत महाजनों तथा सूदखोरों का प्रभाव कम हुआ. दूसरे विश्व युद्ध की वजह से कृषि उत्पादों के कीमत में इजाफे से भी भारत के सहकारिता आंदोलन को लाभ हुआ और वे पहले की तुलना में ज्यादा मजबूत हुई. इस दौर मे क्रय-विक्रय सहकारी समितियों और उपयोगी सहकारी भण्डारों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ.

आधुनिक भारत में  सहकारिता आंदोलन

        भारत के आजाद हो जाने के बाद सहकारिता को केन्द्र और राज्य दोनों के प्रभाव में रखा गया. देश में नेफेड, कृभको, इफको जैसी सार्वजिनक क्षेत्र की बड़ी सहकारी समितियों ने काम करना शुरू किया. हरेक राज्य ने भी बड़े स्तर पर सार्वजनिक समितियों का निर्माण किया. बड़े स्तर पर सरकारी सहातया मिलने के बावजूद आजाद भारत मे सहकारी आंदोलन वह सफलता हासिल नहीं कर सका जो सफलता सहकारी आंदोलन को डेनमार्क और स्वीडन जैसे यूरोपिय देशों में प्राप्त हुई.


        भारत में सहकारी आंदोल की बड़ी सफलता न होने के पीछे कुछ खास वजहे हैं. ज्यादातर समस्याएं सहकारी समितियों की रूपरेखा से संबंधित ही है. इतने विशाल देश और इतनी अधिक जनसंख्या के केवल 20 प्रतिशत जनसंख्या तक ही सहकारी आंदोलन अपनी पहुंच बना सका. साथ ही समितियों को मिलने वाला असीमित उत्तरदायित्व भी इसकी सीमित सफलता का एक प्रमुख कारण है. ज्यादातर समितियां सिर्फ ऋण देने तक ही सीमित रही. समितियों की देख-रेख और प्रबंधन की कमी, साथ ही किसी तरह के ट्रेनिंग प्रोग्राम का न होना भी इस आंदोलन को सीमित बनाता रहा. भारत मे सहकारी आंदोलन को सफल बनाने के लिए सरकार पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता भी इसकी असफलता का कारण बनी. सरकार से सहकार की अवधारणा ने भारत में सहकारिता आंदोलन का फायदा कम और नुकसान ज्यादा पहुंचाया है.


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